अकेला छोड़ आया हूँ...


आज उसे उसके हाल पर,
अकेला छोड़ आया हूँ |
ना चाहते हुए भी उससे,
मुंह मोड़ आया हूँ |

सदियों का रिश्ता जैसे,
पल-भर में छुट गया |
कितना अच्छा यार था मेरा,
वह मुझसे रूठ गया |

जिसके काँधे पर सिर रखकर,
कई बार मैंने रोया था...
आज उसे ही अकेला, रोता छोड़ आया हूँ |
आज उसे उसके हाल पर...
अकेला छोड़ आया हूँ |

हर दिन मुझे उठाता था वह,
जब मैं सोता रहता था...
मुझे दिलासा देता था वह,
जब मैं मायूस होता था |

कई बार उसने मेरी खातिर,
अपनी चाहत को कुर्बां किया |
जब मेरी बारी आई तब...
मैंने उससे मुंह मोड़ लिया |

वह भी सोचता होगा कि,
क्या खूब 'यार' मैं पाया हूँ...
आज उसे उसके हाल पर...
अकेला छोड़ आया हूँ |

माँ...


..☻..

जब भी अकेला होता हूँ, तो बाहें फैला देती है |
इक राह भूलने पर, कई राहें दिखला देती है |
जीवन के पथ पर भटक ना जाऊं
ऐसा जब-भी लगता माँ को, अपनी ऊँगली पकड़ा देती है |

..☻..

जब भी मायूस होता हूँ, तो मेरी पीठ सहला देती है |
हौसला देती है वो मुझको, मेरा दिल बहला देती है |
जीवन के थपेड़ों से जब भी टूट जाता हूँ,
माँ उन्ही अंधेरों में, कई सपने दिखला देती है |

..☻..

कुछ पंक्तिया...


(1)
वो याद तो करता है, पर मुझसे कह नहीं पाता |
पहले तो कहता था कि, तुम बिन कुछ नहीं भाता |
अब क्या हम इतने बेगाने होकर रह गए,
कि मेरे पड़ोस तक आकर, वो मेरे घर नहीं आता |

 (2)
हम भी रूठ गए, तो तुझे सोहबत कौन देगा?
इस वीराने दिल में तेरे, दस्तक कौन देगा? 
इतना मत तड़पा की टूट जाऊं मैं,
गर टूट गया दिल मेरा, तुझे मोहब्बत कौन देगा?