‘वंदना’





कौन थी कैसी थी तुम, कैसे पहचाना था
अब ये सुन,
वो दिन था एक बैसाखी का,
दिल में थी मिलने की धुन

वो पल था बहुत ही खास
प्रिये
जब मिल बैठे थे हम-तुम,
तब भी समझ न पाया तुमको
हार गया था, जब सबके आगे
उस पल साथ में पाया तुमको

आज भी एक पहेली जैसी,
सबसे अच्छी सहेली जैसी
जैसे मेरी संगिनी हो,
या यूँ कह लो अर्धांगिनी हो

शीतल हो तुम चन्दन जैसी
नटखट 'गोपाल-नंदन' जैसी
गंगा की पावन लहरों जैसी हो
मेरे गाँव की नहरों जैसी हो

जेठ की धुप में भी
पीपल की छांव जैसी हो
लहरों में झूझती नाव जैसी
आर्यवर्त के गाँव जैसी

मेरे बचपन के ख्वाब जैसी हो
नव-वर्ष की संध्या पर
‘मधुशाला’ के शबाब जैसी

मुझको बतलादो... कौन हो तुम,
कहना-था तुमको शायद कुछ
फिर भी कितनी मौन हो तुम

नई दुल्हन की, अनंत आशाओं जैसी
पग-पग पर बदलती,
मेरे देश की भाषाओँ जैसी

‘अमित’ का विश्वास तुम्ही हो
मेरे जीवन की आस तुम्ही हो
युगल प्रेमीयों के चाहत जैसी
खुशियों को देती दावत जैसी
  
ब्याह-कर लाई दुल्हन की,
खन-खन करती कंगना हो,
तुम जैसी भी हो...
सुन लो प्रिये,
तुम मेरी ‘वंदना’ हो |

                    " जाने कैसी जिद्द लिए बैठी है,
             आज तो मुझ से भी, पर्दा किये बैठी है
                      'इज़हार-ए-मोहब्बत' जाने कैसे , कब होगा...
                 अपने लबों पर ख़ामोशी का पहरा दिये बैठी है  |"