माँ...


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जब भी अकेला होता हूँ, तो बाहें फैला देती है |
इक राह भूलने पर, कई राहें दिखला देती है |
जीवन के पथ पर भटक ना जाऊं
ऐसा जब-भी लगता माँ को, अपनी ऊँगली पकड़ा देती है |

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जब भी मायूस होता हूँ, तो मेरी पीठ सहला देती है |
हौसला देती है वो मुझको, मेरा दिल बहला देती है |
जीवन के थपेड़ों से जब भी टूट जाता हूँ,
माँ उन्ही अंधेरों में, कई सपने दिखला देती है |

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