स्कुल के बाद हम सबका मिलना
कितनी यादें समेंटे बचपन,
जैसे सब कुछ कल-ही हुआ हो ...
शाम की मस्ती में खो जाना,
मोहल्ले की बस्ती से हो आना
बीच में तेरा घर तो था ही.
तू थी मंज़िल हम थे राही ।
ऊपर से वह खेल पुराना,
लुक्का-छिपी का था बहाना ।
छुप-छुप तेरे घर तक आना,
जैसे सब कुछ कल-ही हुआ हो...
आँखों पर पट्टी बंधवाना,
पहले पाने की ख्वाहिश में...
सबसे अंत में तुझको पाना,
रोज़-रोज़ के कितने झगड़े,
जैसे सब कुछ कल-ही हुआ हो...
किसी का खोना, किसी का पाना,
रोज सबका हाल सुनाना
जैसे मेरा पुराना दूरदर्शन,
अभी-अभी ही नया हुआ हो ।
अंत में मेरा अवलोकन
छोटी बातों का कड़ा निरीक्षण ।
रोज सुबह तेरा सू - दर्शन
जैसे सब कुछ कल-ही हुआ हो ।
