पिछली बार मैं जब घर गया था,
गया था वहाँ भी...
जिस रेत पर तुम घरौंदे बनाती थी |
कुछ टूट गए हैं,
कुछ तो अब भी सलामत हैं |
कुछ बच्चों की टोलियाँ भी,
खेलती हैं वहाँ पर,
पर उसे वे तोड़ते नहीं हैं...
उन्हें वे अच्छे लगते हैं |
पर उसे वे तोड़ते नहीं हैं...
उन्हें वे अच्छे लगते हैं |
पिछली बार मैं जब घर गया था,
उस कसबे की गली से होकर गुज़रा था,
जिस गली में तुम्हारा मकान होता था...
अब वहाँ वो रौनक नहीं है |
तुम्हारे आँगन का वो अमरुद का पेड़,
जो कभी किसी गिलहरी का बसेरा था...
कोई उसकी देखभाल नहीं करता,
अब वह थोडा सूख सा गया है |
उस कसबे की गली से होकर गुज़रा था,
जिस गली में तुम्हारा मकान होता था...
अब वहाँ वो रौनक नहीं है |
तुम्हारे आँगन का वो अमरुद का पेड़,
जो कभी किसी गिलहरी का बसेरा था...
कोई उसकी देखभाल नहीं करता,
अब वह थोडा सूख सा गया है |
पिछली बार मैं जब घर गया था,
उस मंदिर से भी होकर गुज़रा था,
जहाँ रोशनी, तुम्हारे दीये से होती थी |
जहाँ की घण्टियों की आवाज़,
तुम्हारे घुंघरू करते थे...
अब वहाँ कम ही लोग दिखते हैं |
उस मंदिर से भी होकर गुज़रा था,
जहाँ रोशनी, तुम्हारे दीये से होती थी |
जहाँ की घण्टियों की आवाज़,
तुम्हारे घुंघरू करते थे...
अब वहाँ कम ही लोग दिखते हैं |
पिछली बार मैं जब घर गया था,
मिला था उन लोगों से भी...
जिनसे तुम रोज़ मिलती थी, टहलते हुए |
सब तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे,
मेरी तरह ही...
मिला था उन लोगों से भी...
जिनसे तुम रोज़ मिलती थी, टहलते हुए |
सब तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे,
मेरी तरह ही...
सब तुम्हें याद करते हैं |
पिछली बार मैं जब घर गया था,
गया था वहाँ भी...
जहाँ तुम्हारी खुशबू है, साँसें हैं, बातें हैं और किस्से भी,
गया था वहाँ भी,
जहाँ तुम नहीं बस तुम्हारी याद है |
जहाँ तुम नहीं...
गया था वहाँ भी...
जहाँ तुम्हारी खुशबू है, साँसें हैं, बातें हैं और किस्से भी,
गया था वहाँ भी,
जहाँ तुम नहीं बस तुम्हारी याद है |
जहाँ तुम नहीं...
पिछली बार मैं जब...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें