चाहता हूँ

चाहता हूँ
इस भीड़ भरी जगह से निकलकर
एक ऐसी जगह जाऊँ
जहाँ बस सन्नाटों का शोर हो ।

पर,
ऐसी जगह क्या सच में है,
ढूँढने निकला,
तो एक दिल ही मिला मुझे मेरा
जो बेहद खामोश है।
उसी तरह जैसे बिछड़ने से पहले
तुम खामोश थी।

तुम्हारे दोनों होंठ एक दूसरे से
अलग होने को तैयार ही नहीं थे,
तो क्या पूछता तुमसे
तुम कोई जवाब ही नहीं देती।

कल तुम्हारी एक तस्वीर मिली मुझे
उसी किताब के पन्नों के बीच
जो तुमने आखिरी बार दी थी मुझे।
दम घूंट सा गया है उसका
वो भी अब कुछ नहीं कहती
न ही मुस्कुराती है।

चाहता हूँ
इस भीड़ भरी जगह से निकलकर
एक ऐसी जगह जाऊँ
जहाँ खुद से वाकिफ़ हो पाऊँ।

ये मैं ही तो हूँ
जो कभी खुद से भी नहीं मिलता
तुम्हारी यादों के पीछे भागते- भागते
खुद को ही भूल सा गया हूँ मैं।

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